उम्मीद का दीपक: बाल-मित्र केंद्र (CFS) की भूमिका
कोसी नदी की बाढ़ के बाद बाल-मित्र केंद्र ने फिर से जगाई मुस्कुराने, पढ़ने और सीखने की लौ
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साल 2024 में आई कोसी नदी की भीषण बाढ़ ने बिहार के बेलागोंठ गाँव को बुरी तरह प्रभावित किया। बाढ़ में गाँव का प्राथमिक विद्यालय पूरी तरह बह गया और बच्चों की पढ़ाई अचानक रुक गई। चारों ओर डर का माहौल बन गया, बच्चों में मानसिक तनाव और पढ़ाई छूट जाने की चिंता घर कर चुकी थी।
लेकिन इसी अंधेरे के बीच “बाल सहज सह मनोसामाजिक संबल केंद्र” बच्चों के लिए उम्मीद की नई रोशनी की तरह उभरा। यह केंद्र (Child-Friendly Space – CFS) बच्चों के लिए उनके दोस्त की तरह सहारा देने वाला स्थान है। जिसे यूनिसेफ की साझेदार संस्था GPSVS ने शुरू किया है।
10 वर्षीय कारी सादा याद करते हुए कहता है, “बाढ़ के बाद हम बहुत डर गए थे। हमारा स्कूल खत्म हो गया था, लेकिन यहाँ हम खेलते हैं, पढ़ते हैं और फिर से खुशी महसूस करते हैं।”
यह बाल-अनुकूल केंद्र स्थानीय स्वयंसेवक गायत्री देवी की देखरेख में चलने वाला यह CFS बच्चों को पढ़ाई, खेल और भावनात्मक सहारे के लिए एक सुरक्षित जगह देता है, जहाँ वे बिना डर के सीखते हैं, खेलों में भाग लेते हैं और अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
यहाँ बच्चे खेलों के ज़रिए अक्षर और अंक सीखते हैं, चित्र बनाते हैं, अपनी बातें साझा करते हैं और पारंपरिक लोकगीत गाते हैं। रंग-बिरंगी तस्वीरों में वे अपने गाँव, घर और सपनों को उकेरते हैं—जो उनके भीतर लौटती उम्मीद की झलक है।
स्थानीय अभिभावक समतोलिया मांझी कहते हैं कि, “मेरा बच्चा यहाँ बहुत खुश रहता है। वह दोस्तों के साथ खेलता है और कुछ नया सीखता है। मैं GPSVS और यूनिसेफ का धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने हमारे बच्चों को यह ज़रूरी सहारा दिया।”
डुबियाही पंचायत के मुखिया रमानंद यादव भी इस केंद्र के शुरू होने से बेहद प्रसन्न हैं। उनका मानना है कि जब तक स्कूल पूरी तरह से दोबारा शुरू नहीं हो जाते, तब तक यह केंद्र बच्चों के लिए बेहद ज़रूरी है और इसे जारी रहना चाहिए।
साझी कोशिश से होगा बच्चों का उज्ज्वल भविष्य
यह चाइल्ड फ्रेंडली स्पेस मॉडल, जिसमें समुदाय, स्थानीय सरकार और यूनिसेफ ने मिलकर काम किया है, इस बात का उदाहरण है कि सामूहिक प्रयास से आपदा के समय भी बच्चों की सुरक्षा, मानसिक भलाई और सीखने की प्रक्रिया को जारी रखा जा सकता है।
बेलागोंठ गाँव में यह केंद्र सिर्फ़ एक अस्थायी व्यवस्था नहीं है। बल्कि, यह बच्चों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि मुश्किल हालात में भी उनकी पढ़ाई, खुशी और बचपन मायने रखता है।