एनीमिया पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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प्रश्न: ए‍नीमिया (खून की कमी) क्‍या है?

उत्तर: मनुष्‍य के रक्‍त में हीमोग्‍लोबिन नामक लाल पिग्‍मेंट होता है जो फेफड़ों और शरीर के विभिन्न अंगों में आक्सीजन पहुंचाता है। हीमोग्‍लोबिन को लाल, सशक्‍त और स्‍वस्‍थ बनाने के लिए, मुख्यतः आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन सी, प्रोटीन और विटामिन बी12 चाहिए – ये अनिवार्य पोषक तत्व हैं और हमारा शरीर इनका निर्माण अपने आप नहीं कर सकता। 

इन्‍हें भोजन में लेने की जरूरत होती है। आहार में इन पोषक तत्‍वों की कमी से हीमोग्‍लोबिन की सघनता (गाढ़ापन) कम हो जाती है जिससे यह पतला और पीला हो जाता है। जब हीमोग्‍लोबिन की सघनता व्‍यक्ति की आयु और लिंग समूहों के लिए निर्धारित स्तर से कम होती है तो इसे एनीमिया (खून की कमी) कहा जाता है।

हीमोग्‍लोबिन सघनता की कमी से शरीर के विभिन्न अंगों में ऑक्‍सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है जिससे शरीर की कोशिकाएं और ऑर्गेनिक सिस्‍टम सुचारु रूप से काम नहीं कर पाते। इन सभी पोषक तत्‍वों में आयरन (लौह) की कमी से होने वाला एनीमिया अधिक आम है। सभी प्रकार के एनीमिया में से, आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया 50 प्रतिशत से अधिक मामलों में पाया जाता है। 

सभी प्रकार के ए‍नीमिया में, आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया सबसे आम है। बुखार की तरह एनीमिया एक लक्षण (मैनिफिस्‍टेशन) है, न कि कोई बीमारी, इसका सबसे आम कारण आयरन की कमी है। अन्‍य कारणों में अन्‍य विटामिन और मिनरल की कमी शामिल है जैसे विटामिन ए, बी, फोलिक एसिड और जिंक, मलेरिया और कृमि संक्रमण शामिल हैं।

प्रश्‍न: एनीमिया एक समस्या क्‍यों है?

उत्तर: भारत में 10-19 वर्ष आयु समूह के युवाओं की 120 करोड़ में से 24.3 करोड़ संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। इस आयु समूह को किशोर वर्ग कहा जाता है और इसमें भारत की जनसंख्या का एक-चौथाई हिस्‍सा शामिल है। यह भारत के भावी आर्थिक विकास का प्रमुख संचालक है। तथापि, भारत में 15-19 वर्ष आयु समूह के कुछ प्रतिशत बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं।

एनीमिया के कारण युवकों और युवतियों की मानसिक और शारीरिक क्षमता क्षीण हो रही है, उनका शारीरिक विकास रूक रहा है, जिससे उन्‍हें थकान महसूस होती है, सांस फूलती है और दैनिक कार्य करने के लिए उनकी याददाश्त और ऊर्जा नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रही है।

किशोर आयु में विवाह और गर्भधारण भारत में, विशेषकर ग्रामीण भारत में, अभी भी प्रचलित है। गर्भावस्था में लड़कियों में खून की कमी से कम वजन के शिशु को जन्म देने का जोखिम बढ़ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप जन्म के समय जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। शोध के अनुसार जीवन के पहले वर्ष के बाद, किशोरावस्‍था दूसरी अधिकतम तेज विकास वाली अवधि होती है।

यदि किशोरों को उचित आहार दिया जाए और सही देखरेख की जाए तो वे इस अवधि में अपने वयस्‍क वजन का 50 प्रतिशत तक वजन, अपने कद का 20 प्रतिशत कद और अपने वयस्‍क कंकाल/अस्थि द्रव्‍यमान का 50 प्रतिशत तक हासिल कर सकते हैं। जिस देश के युवक व युवतियों को आगे बढ़ना चाहिए वे एनीमिया से अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता प्राप्त करने में पिछड़ जाते हैं।   

प्रश्‍न: आयरन (लौह) की कमी के क्‍या कारण हैं?

उत्तर: शरीर द्वारा आयरन की जरूरत आंत द्वारा अवशोषित किए गए आयरन से अधिक होने पर शरीर में स्‍टोर किए गए आयरन का उपयोग होता है। यह अवस्‍था लंबे समय तक बनी रहने पर, आयरन का स्‍टोर खाली होने लगता है और रक्‍त में आयरन की कमी हो जाती है।

आमतौर पर, हमारे भोजन में आयरन के कम सेवन से अथवा किसी कारण से भोजन से आयरन को अवशोषित करने में रुकावट के कारण एनीमिया विकसित हो जाता है। इसके अलावा, भारी चोट, प्रसव चोट या सर्जरी के दौरान अधिक खून बह जाने और आंत में हुक वर्म/राउंड वर्म होने और मलेरिया होने के मामले में एनीमिया हो जाता है, इस दौरान हीमोग्‍लोबिन में खराबी आ जाती है।

प्रश्‍न: किशोरों में आयरन की कमी का जोखिम क्‍यों होता है?

उत्तर: किशोरावस्‍था के दौरान, कद और वजन और लैंगिक परिपक्वता में तेजी से बढ़ोतरी होती है। इसके अलावा किशोरियों में माहवारी की शुरुआत हो जाती है जिसकी वजह से प्रतिमाह रक्‍त का नुकसान होता है। इन अतिरिक्‍त मांगों से निपटने के लिए, आयरन की अधिक जरूरत होती है। यदि यह उपलब्‍ध नहीं होता तो किशोरियों में खून की कमी आ जाती है और इससे एनीमिया हो जाता है।

प्रश्‍न: खून की कमी व्‍यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?

उत्तर: खेलने, चलने, सीढ़ियां चढ़ने से खून की कमी वाले व्‍यक्ति की सांस फूलने लगती है और वह थका हुआ महसूस करता है। घर के छोटे-मोटे कामों से भी थकान हो सकती है। याद रखने और सीखने की क्षमता कम हो जाती है। आप अक्‍सर बीमार रहने लगते हैं और काम करते समय अथवा जो कुछ पढ़ा हो उसे याद रखने में दिक्कत होती है। इससे शैक्षिक सफलता में कमी आती है।

खून की कमी वाले बच्चों का गणित की परीक्षा में औसत से कम अंक पाने का जोखिम दोगुना रहता है। स्कूल जाने वाले बच्चे अकसर बीमार पड़ जाते हैं जिससे वे स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं। लड़कियों में गर्भावस्था के दौरान खून की कमी से एनीमिक बच्‍चे को जन्म देने का जोखिम रहता है: यह एक दुष्‍चक्र है, जन्म के समय शिशु का वजन कम होता है और प्रसव के दौरान उनका स्वयं का जीवन प्रभावित होता है।

प्रश्‍न: हम इसकी रोकथाम कैसे कर सकते हैं?

उत्तर: भोजन में लौह से भरपूर पदार्थ जैसे पालक, मेथी, सरसिया, सुआ नी भाजी (सोया पत्ता की सब्जी), अजमान ना पान बाजरा, खजूर, मांस, मछली, अंडे और सप्ताह में एक बार आयरन फोलिक एसिड (आईएफए) की टेबलेट लेना एनीमिया से बचने का प्रभावी साधन है। ऊपर बताए आहार के अलावा, किशोरों में कीड़ों की रोकथाम के लिए छह महीने में एक बार कृमि की दवा दी जानी चाहिए।

भोजन से दो घंटे पहले और बाद में चाय और कॉफी पीने से बचना चाहिए, क्योंकि ये शरीर में आयरन का अवशोषण रोकते हैं। लौह-युक्त भोजन के साथ विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थों जैसे आंवला, अमरूद, बेर, संतरा और नींबू का सेवन करना चाहिए, क्योंकि इससे आयरन के अवशोषण में सुधार आता है।

प्रश्‍न: क्‍या आयरन की कमी की रोकथाम के लिए आयरन टेबलेट जादुई गोली है?

उत्तर: जी हां। ऐसा इसलिए, क्योंकि शाकाहारी भोजन से लौह को प्रभावी तरीके से अवशोषित नहीं किया जाता। किशोर और किशोरियों को यह टेबलेट सप्ताह में एक बार लेनी चाहिए। यह कोई दवा नहीं बल्कि एक पोषक तत्व है जो आपको भोजन से मिलता है। चूंकि इस पोषक तत्व की आवश्यकता अधिक होती है और आहार से इसकी पूर्ति नहीं हो सकती इसलिए टेबलेट के रूप में इसकी प्रति पूर्ति की जाती है।

प्रश्‍न: आयरन टेबलेट लेने के प्रतिकूल प्रभाव क्‍या-क्‍या हैं?

उत्तर: जब आयरन की टेबलेट पहली बार ली जाती है तो शरीर के लिए इसे पचाना थोड़ा कठिन हो सकता है और इससे पेट दर्द और मितली आने जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। लेकिन भोजन के बाद आयरन की टेबलेट लेने पर अवशोषण थोड़ा कम होगा मगर पेट दर्द और मितली जैसे प्रभाव नहीं होंगे। कुछ सप्‍ताह तक टेबलेट लेते रहने पर ये प्रतिकूल प्रभाव ख्‍त्‍म हो जाते हैं क्‍योंकि शरीर आयरन टेबलेट के प्रति ढल जाता है।

कुछ लोगों को मल काला होने की शिकायत हो सकती है लेकिन यह पूरी तरह से नुकसान रहित है। शरीर आवश्‍यकता अनुसार आयरन ले लेता है और अतिरिक्‍त आयरन मल द्वारा शरीर से बाहर आ जाता है। प्रतिकूल प्रभावों से बचने के लिए टेबलेट को कभी खाली पेट नहीं लेना चाहिए। बीमारी में किसी विटामिन अथवा पोषक तत्‍व को लेने की कभी मनाही नहीं होती। बल्कि इससे शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता में सुधार होता है और बीमारी से तेजी से उबरने में मदद मिलती है।

प्रश्‍न: आईएफए टेबलेट कैसे लें – क्‍या करें?

उत्तर: एक टेबलेट लें,

  • टेबलेट को निगलें, 
  • पेट भर कर खाना खाएं, 
  • टेबलेट लेने के बाद एक गिलास गर्म पानी पीएं।

प्रश्‍न: आईएफए टेबलेट कैसे लें, क्‍या न करें?

उत्तर: टेबलेट चबाए नहीं, 

  • पीसे नहीं, 
  • तोड़े नहीं, 
  • खाली पेट न लें, 
  • दूध के साथ न लें।