नेतृत्व का समय: भारत के बच्चों को गैर-संचारी रोग (एनसीडी) से बचाने के लिए करने होंगे सामुहिक प्रयास
लाखों बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य, सपनों और भविष्य को खतरे में डाल रहा असामान्य, गैर-संचारी रोगों (NCDs) का बढ़ता संकट
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भारत इस समय एक बड़े स्वास्थ्य परिवर्तन से गुजर रहा है। जहाँ एक ओर देश ने बाल मृत्यु दर कम करने और संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण पाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, वहीं दूसरी ओर एक शांत लेकिन गंभीर स्वास्थ्य संकट उभर रहा है।
गैर-संचारी रोग (एनसीडी) — जैसे मधुमेह, अस्थमा, जन्मजात हृदय रोग और सिकल सेल एनीमिया — अब भारत में होने वाली कुल मौतों का लगभग 60 प्रतिशत कारण हैं।1 चिंताजनक बात यह है कि इन बीमारियों का खतरा अब बच्चों तक तेजी से पहुँच रहा है।
साल 2017 में, गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) ने दुनियाभर में लगभग 21 लाख बच्चों को प्रभावित किया2, जिनमें से 20 वर्ष से कम उम्र के 10 लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु हो गई।3 भारत में (एनसीडी) केवल बड़ों की बीमारियाँ नहीं हैं, बल्कि ये बचपन को प्रभावित करने के साथ भविष्य को आकार दे रही हैं।
गैर-संचारी रोगों (NCDs) की रोकथाम घर में, स्कूलों में और समुदायों में शुरू होनी चाहिए। अब समय है सामुहिक प्रयासों से कलंक को चुनौती देने, जागरूकता बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने का कि हर बच्चे को स्वस्थ जीवन जीने का अवसर मिले।
“बचपन ही एनसीडी से लड़ाई की पहली पंक्ति है। आज हम जो करेंगे, वही भारत के भविष्य के स्वास्थ्य को तय करेगा।” — यूनिसेफ स्वास्थ्य विशेषज्ञ
गैर-संचारी रोग (एनसीडी) के बारे में जो आपको जानना चाहिए
“जब से कंचन तीन साल की थी, उसे लगातार बुखार रहता था,” उसके पिता याद करते हैं। “दवा लेने से थोड़ी देर के लिए आराम मिलता था, लेकिन बुखार फिर लौट आता था।”
“जब उन्होंने मुझे इंसुलिन दिखाया, तो मैं रो पड़ी। सुइयां बहुत डरावनी लग रही थीं,” पल्लवी याद करती है। लेकिन आज वह शांत आत्मविश्वास के साथ कहती है, “अगर मैं इतनी बड़ी हूँ कि मुझे डायबिटीज़ हो सकती है, तो मैं अपने इंजेक्शन खुद भी लगा सकती हूँ।”
भविष्य पर असर
कई बच्चों के लिए एनसीडी (गैर-संचारी रोग) के साथ जीना सिर्फ रोज़ दवा लेना या बार-बार अस्पताल जाना नहीं है। इसका मतलब है कक्षा में भेदभाव झेलना, साथियों में घुलने-मिलने की चिंता करना और विकास व आगे बढ़ने के अवसरों से वंचित रहना।
टाइप 1 डायबिटीज़ से पीड़ित बच्चे को लगातार निगरानी की ज़रूरत होती है; दमा (अस्थमा) खेलकूद और दौड़-भाग को सीमित कर देता है; और सिकल सेल एनीमिया से जूझते बच्चे और उनके परिवार रोज़ाना भारी बोझ उठाते हैं।
सकारात्मक आदतें, मजबूत भविष्य
अच्छी खबर यह है कि बचपन के एनसीडी को अगर समय पर पहचान लिया जाए तो इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। समय पर इलाज — जैसे दवाइयाँ, नियमित स्वास्थ्य निगरानी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना — दीर्घकालिक जटिलताओं को काफी हद तक कम कर सकता है और बच्चे को स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीने में मदद करता है।
बचपन हमें स्वस्थ वयस्क जीवन की नींव रखने का अनोखा अवसर देता है: वयस्कों में 70 प्रतिशत तक रोके जा सकने वाली एनसीडी मौतों के जोखिम किशोरावस्था में शुरू होते हैं। इसलिए बचपन और किशोरावस्था रोकथाम के लिए बहुत महत्वपूर्ण समय है। स्वस्थ आहार, शारीरिक गतिविधि और समय पर जांच को प्रोत्साहित करना भविष्य में एनसीडी के बोझ को काफी कम कर सकता है।
बचपन में एनसीडी (गैर-संचारी रोग) होने के कारण
बचपन में एनसीडी कई वजहों से हो सकते हैं। इसमें गर्भावस्था और माँ के स्वास्थ्य की स्थिति, शुरुआती जीवन में पोषण, आसपास का वातावरण, सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ, शहरों में बढ़ती आबादी और जीवनशैली में बदलाव जैसी बातें शामिल हैं। इसके अलावा, कुछ बीमारियाँ आनुवंशिक (जेनेटिक) कारणों से भी बच्चों को प्रभावित करती हैं।
बच्चों में गैर-संचारी बीमारियाँ कई वजहों से हो सकती हैं। कुछ बच्चों को ये बीमारी जन्म से मिलती है (जैसे सिकल सेल एनीमिया), कुछ बच्चों की गलत खान-पान और आदतों से (जैसे ज़्यादा मीठा या जंक फूड खाने से टाइप 2 डायबिटीज), और कुछ मामलों में आसपास का वातावरण कारण बनता है (जैसे प्रदूषण से अस्थमा)।
“अगर समय पर कदम न उठाए जाएँ तो कीमत बहुत भारी पड़ती है — स्वास्थ्य के लिए भी और अर्थव्यवस्था के लिए भी। बचपन में रोकथाम हमारी सबसे अच्छी निवेश है,” छत्तीसगढ़ के एक बालरोग विशेषज्ञ कहते हैं।
एक साझा संकल्प
यूनिसेफ, भारत सरकार के सहयोग से, बच्चों में गैर-संचारी रोगों (NCDs) के जल्दी पता लगाने, उपचार और जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन कर रहा है। बच्चों में NCDs के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का विकास अगली पीढ़ी के लिए मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली बनाने में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अभियान में जुड़ें - चुप्पी तोड़ें - हमारे बच्चों की सुरक्षा करें - अब समय है नेतृत्व करने का…!