COVID-19 के समय में पुलिस की भूमिका की पुनर्कल्पना

भारत में पुलिस महामारी के दौरान हिंसा की रोकथाम और बाल अधिकारों के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

Tannistha Datta, Sharmila Ray and Moira Dawa
Covid19 Response planning by the police in Uttar Pradesh.
Media Cell, SP office, Bahraich, Uttar Pradesh
30 जून 2020

बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए एक केंद्र के निर्माण की घोषणा भारत में बच्चों के लिए एक बड़ी जीत है। यह घोषणा 12 मई 2020 को यूनिसेफ के सहयोग से राष्ट्रीय पुलिस अकादमी द्वारा आयोजित ‘COVID-19 के दौरान बाल संरक्षण’ नामक वेबिनार के अवसर पर की गई।

श्री अतुल करवाल, आईपीएस, डिरेक्टर, राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, ने बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए एक समर्पित केंद्र स्थापित करने की योजना की घोषणा करते हुए कहा, “पुलिस समुदाय के साथ मिलकर एक बल गुणक के रूप में कार्य कर सकती है, उस प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए जिसके साथ वे COVID-19 के दौरान बच्चों की सहायता करते हैं”।

COVID-19 ने उन वातावरणों को बाधित किया है जिसमें बच्चे बढ़ते और विकसित होते हैं। परिवारों, दोस्ती, दैनिक दिनचर्या और व्यापक समुदाय का ये व्यवधान बच्चों के कल्याण, विकास और संरक्षण पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

इसके अलावा, COVID-19 को फैलने से रोकने और इस पर काबू पाने के लिए किए गए उपायों से बच्चों पर संरक्षण जोखिम हो सकता है। घर पर, किसी केंद्र में, या किसी क्षेत्र में क्वारंटाइन और आइसोलेशन के उपाय बच्चों और उनके परिवारों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। घरेलू हिंसा बढ़ने के संकेत भी मिले हैं।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, मिस स्वाति शर्मा ने विश्व बाल दिवस के अवसर पर उदयपुर, राजस्थान में स्कूली बच्चों के साथ बातचीत की।
Sindhu Binujeeth, Consultant, Udaipur Division, Rajasthan
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, मिस स्वाति शर्मा ने विश्व बाल दिवस के अवसर पर उदयपुर, राजस्थान में स्कूली बच्चों के साथ बातचीत की।

लॉकडाउन के पिछले कुछ सप्ताह में, उदाहरण के लिए, चाइल्डलाइन, बच्चों के लिए एक आपातकालीन हेल्पलाइन, ने संकट में पड़े बच्चों से कॉल में 50 प्रतिशत बढ़त की सूचना दी। COVID-19 के दौरान, परिवार इसका सामना करने के लिए कुछ नकारात्मक उपायों का सहारा भी ले सकते हैं, जैसे कि बाल श्रम या बाल विवाह। हाल में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने सूचित किया कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद से चाइल्डलाइन की कोशिशों के ज़रिए 898 बाल विवाह रोके गए हैं।

ऐसे हालात में, पुलिस को एक जरूरी भूमिका निभानी है। चाहे संकट में पड़े बच्चों की मदद करना हो, शिविरों और अस्थायी आश्रयों में प्रवासी आबादी के प्रति होने वाली हिंसा को रोकना सुनिश्चित करना हो, बाल अधिकारों के किसी भी उल्लंघन की सूचना देने में सतर्क बने रहना और जिम्मेदार बनना हो या बच्चों को बाल संरक्षण सेवाओं में भेजना सुनिश्चित करना हो।

यूनिसेफ ने COVID-19 के दौरान बच्चों को हिंसा और शोषण से बचाने के लिए पुलिस की भूमिकाओं पर एक दिशानिर्देश बनाया है। इन्हें कई राज्यों में अपनाया गया है और प्रयोग में लाया जा रहा है।

मानवाधिकार शासन का एक मुद्दा है। हर नागरिक को आपदाओं से संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है - ये सामाजिक नीति है।

आमतौर पर नीतियों को अपराध की रोकथाम और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन हमें समझ आ रहा है कि ये इससे कही अधिक है।

हम इस दायरे को बढ़ा रहे हैं। हमने COVID​​-19 के प्रति अपनी मानवीय प्रतिक्रिया के ज़रिए पुलिस बल में जनता का विश्वास बनाया है।

- श्री एस एन प्रधान, पुलिस महानिदेशक, राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल (एनडीआरएफ)।

वेबिनार में COVID-19 के दौरान बच्चों के सामने आई विशेष चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया और पुलिस की भूमिका को उजागर किया गया क्योंकि वे नागरिकों खासकर बच्चों के कल्याण के लिए काम कर सकते हैं। इसने देश भर के पुलिस अफसरों को एक प्लेटफार्म भी दिया जिस पर वो अपने अनुभव और सीख साझा कर सकते हैं।

इस संवादात्मक ज्ञान सत्र का दीर्घावधिक उद्देश्य बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में रूचि रखने वाले, जानकारी रखने वाले और कुशल अफसरों का एक नेटवर्क/ दस्ता बनाना है जिसके द्वारा बच्चों को हिंसा और नुकसान से बचाने के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन का निर्माण किया जा सके।

वेबिनार को संबोधित करते हुए डॉ यास्मिन अली हक़, भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि ने कहा, “पुलिस यूनिसेफ के बाल संरक्षण कामों में एक सबसे महत्वपूर्ण पार्टनर है। ये ऐसी किसी भी स्थिति में सबसे पहले रेस्पोंड करते हैं जहाँ बच्चों पर संकट होता है। इसलिए, बच्चों की प्रति उनकी संवेदनशीलता और सभी मामलों को संभालने का उनका तरीका, उस अनुभव और विश्वास के लिए आवश्यक है – जो बच्चे न्याय प्रणाली पर करेंगे।”

“बच्चे भारत की आबादी का 40% हिस्सा हैं। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी जनरल अंटोनियो गुटेरेस ने हाल में कहा था, भले ही बच्चे COVID-19 महामारी का चेहरा नहीं हैं, लेकिन वो इसका सबसे बड़ा शिकार हैं।”

डॉ हक़ ने कहा, “हमें राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के साथ भागीदारी करके गर्व महसूस हो रहा है कि हम एक-साथ मिलकर सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोगों में COVID-19 के प्रभावों को कम किया जाए और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते महत्वपूर्ण इकाई जैसे कि पुलिस से वो सुरक्षा मिल सके जिसके वो हक़दार हैं।”

सहयोगात्मक भागीदारी की शक्ति  

यूनिसेफ भारत में 17 राज्यों में काम करता है और पुलिस के साथ एक मजबूत सहयोग और भागीदारी रखता है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यूनिसेफ राज्य पुलिस को चाइल्ड फ्रेंडली नीतियों की पहल पर तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है, जिसके कारण बच्चों के प्रति संवेदनशील पुलिस राज्य पुलिस बलों की संस्कृति का हिस्सा बन गई है।

झारखंड में यूनिसेफ और पुलिस ने संकेतकों (इंडिकेटर्स) का एक सेट बनाया है और एक समिति का गठन किया है जो पुलिस स्टेशनों पर नज़र रखती है और पुलिस स्टेशनों को चाइल्ड फ्रेंडली करार देती है। ये सिर्फ एक संरचना मात्र नहीं है बल्कि इसके लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है और बच्चों से जुड़े मामलों को संभालने में पुलिस एक निश्चित प्रक्रिया का भी पालन करती है।

पश्चिम बंगाल में, यूनिसेफ निर्भया फंड का इस्तेमाल करके महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाली हिंसा को रोकने के लिए कार्यक्रमों की योजना बनाने और लागू करने में कोलकाता पुलिस का सहयोग कर रहा है।

ओडिशा में, यूनिसेफ और राज्य पुलिस ने बाल यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए राज्यव्यापी अभियान चलाया, और इसकी रोकथाम और रेस्पोंस में पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका का प्रदर्शन किया।