बाधाएँ तोड़ते हुए : संकल्प बोटरे की हिम्मत और हौसले की कहानी

राष्ट्रीय पैरा-स्विमिंग चैंपियन से लेकर समावेशन के प्रतीक तक — समाज को नई दिशा देती संकल्प की यात्रा

UNICEF
Para-swimmer Sankalp Botre, 30, proudly displays his medals at home in Pune.
UNICEF/UNI846952/Magray
03 सितंबर 2025

पुणे, महाराष्ट्र — सिर्फ़ 30 साल की उम्र में संकल्प सतीश बोटरे, पिंपरी-चिंचवड़ (संत तुकाराम नगर) के निवासी, हिम्मत, उपलब्धि और सेवा की मिसाल बन चुके हैं।

वे न केवल राष्ट्रीय पैरा-स्विमिंग चैंपियन हैं, जिन्होंने देश-विदेश की प्रतियोगिताओं में अब तक 28 मेडल (सोना, चांदी और कांस्य) जीते हैं, बल्कि अब वे एक विकलांगता समावेशन समर्थक भी हैं, जो अपने अनुभवों से दूसरों का जीवन आसान बनाने में जुटे हैं।

जन्म से ही लोकोमोटर विकलांगता के साथ जी रहे संकल्प की ज़िंदगी ने तब मोड़ लिया, जब डी.वाई. पाटिल अस्पताल (पीसीएमसी) में इलाज के दौरान डॉक्टर ने उन्हें तैराकी करने की सलाह दी। संकल्प के लिए शुरुआत में जो थेरेपी थी, वही आगे चलकर उसका जुनून बन गई।

तैराकी से मिली नई पहचान

परिवार और पिता के साथ ने संकल्प को आगे बढ़ाया। संकल्प के पिता ने उन्हें बहुत सहयोग किया, उनका हौसला बढ़ाया — उसके पिता स्वयं भी राज्य स्तरीय एथलीट रह चुके हैं। उनकी मेहनत और अनुशासन ने उन्हें अमेरिका, चीन, जापान, थाईलैंड, न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड जैसे देशों तक प्रतियोगिताओं में पहुँचाया।

उनके मेडल केवल जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि उनकी दृढ़ता और पहचान की निशानी हैं।

Sankalp Botre, 30, looks through old photos with his family at their home in Pimpri Chinchwad, Pune.
UNICEF/UNI846956/Magray Sankalp Botre, 30, looks through old photos with his family at their home in Pimpri Chinchwad, Pune.
पीसीएमसी-डीबीएफ से जुड़ाव

आज संकल्प पिंपरी चिंचवड़ महानगर पालिका दिव्यांग भवन फाउंडेशन (PCMC-DBF) में काम करते हैं। यह देश का पहला ऐसा दिव्यांग-समावेशी केंद्र है, जिसे किसी नगर निगम ने शुरू किया है।

यहां वे लिफ्ट ऑपरेटर के पद पर कार्यरत हैं। पद भले ही साधारण लगे, लेकिन उनका योगदान बहुत ज्यादा है — वे यह सुनिश्चित करते हैं कि दिव्यांगजन आसानी और गरिमा के साथ सेवाओं तक पहुँच सकें।

हर दिन उनका सफ़र मेट्रो से होता है। सुबह पिता उन्हें सीढ़ियों तक छोड़ते हैं और वहाँ से वे खुद सफ़र तय करते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में उनकी चुनौतियों और परिवार के समर्थन दोनों की झलक साफ नजर आती है।

Sankalp Botre, 30, books a ticket at the metro station on his way to PCMC-DBF in Pimpri Chinchwad.
UNICEF/UNI846961/Magray Sankalp Botre, 30, books a ticket at the metro station on his way to PCMC-DBF in Pimpri Chinchwad.
पीसीएमसी-डीबीएफ का असर

1 फरवरी 2024 को शुरू हुए इस केंद्र ने अगस्त 2024 से अब तक 750 से अधिक दिव्यांग व्यक्तियों को सेवाएं दी हैं। यहाँ काउंसलिंग, आकलन, विशेष शिक्षा, सहायक उपकरण और प्रशिक्षण जैसी सेवाएँ उपलब्ध हैं।

यहां काम करने वाले 41 कर्मचारियों में से 8 दिव्यांगजन हैं — जिनमें संकल्प भी शामिल हैं। यही इसे वास्तव में समावेशी बनाता है।

संकल्प की देखभाल के लिए पीसीएमसी हर महीने 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता भी करता है। यह छोटा-सा सहयोग भी स्थानीय प्रशासन की बड़ी सोच को दर्शाता है।

2025 में यूनिसेफ के साथ साझेदारी ने इसे और मज़बूती दी। मार्च 2025 में पर्पल फेस्टिवल के दौरान डिसेबिलिटी-इनक्लूसिव प्रोग्रामिंग स्ट्रेटेजी की घोषणा की गई, जो स्वास्थ्य, शिक्षा, जल-स्वच्छता और बाल संरक्षण जैसी सेवाओं में समावेशन सुनिश्चित करती है।

Sankalp Botre, 30, waits outside the metro station on his way to PCMC-DBF in Pimpri Chinchwad.
UNICEF/UNI846959/Magray Sankalp Botre, 30, waits outside the metro station on his way to PCMC-DBF in Pimpri Chinchwad.

संकल्प के लिए, पीसीएमसी-डीबीएफ सिर्फ काम करने की जगह नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्थान है जहाँ समावेशन (इंक्लूजन) केवल नियमों तक सीमित ना रहकर आम रोज़मर्रा की जिंदगी में प्रैक्टिस में लाया जाता है। 

यहां वे आगंतुकों को रास्ता दिखाते हैं, योजनाओं की जानकारी देते हैं और अपने प्रोफेशनल अंदाज़ से समाज को एक संदेश देते हैं कि लोग किसी भी कमी के बावजूद आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं। उनकी मौजूदगी से अब लोगों की सोच बदलने लगी है। अब संस्थानों व समुदायों के बीच की दूरी कम हो रही है।

घर पर संकल्प के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत उनके माता-पिता, सतीश और सविता हैं, वे हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाते हैं। उनकी बहन जो एक शिक्षिका हैं, वह भी सेवा की इसी भावना को आगे बढ़ा रही हैं।

UNICEF’s Arjan de Wagt and Sanjay Singh interact with Sankalp Botre, 30, at DBF in Pimpri Chinchwad.
UNICEF/UNI846860/Magray UNICEF’s Arjan de Wagt and Sanjay Singh interact with Sankalp Botre, 30, at DBF in Pimpri Chinchwad.
बदलाव की मिसाल

तैराकी के मैदानों से लेकर PCMC-DBF के गलियारों तक, संकल्प की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि जब सहयोग और लगन साथ आते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है। उनकी कहानी सिर्फ मुश्किलों को पार करने की नहीं है, बल्कि इस बात की भी है कि व्यवस्था को कैसे सबके लिए समान और सुलभ बनाया जा सकता है।

अपनी शांत और दृढ़ निश्चय वाली सोच के साथ, संकल्प आज शहरी जीवन में समावेशन (इन्क्लूज़न) का सशक्त प्रतीक हैं — एक-एक लिफ्ट की सवारी के साथ।