गाउट महुदी में उच्च प्राथमिक विद्यालय

एक धूप भरी दोपहर में गौथ महुदी (आसपुर प्रखंड, जिला गुर्गापुर) के उच्च प्राथमिक विद्यालय में कुछ दस साल के बच्चे ज़मीं पर भारत का नक्षा पेंट कर रहे हैं |

UNICEF India
A girl in classroom.
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24 जून 2019

एक धूप भरी दोपहर में गौथ महुदी (आसपुर प्रखंड, जिला गुर्गापुर) के उच्च प्राथमिक विद्यालय में कुछ दस साल के बच्चे ज़मीं पर भारत का नक्षा पेंट कर रहे हैं | पास में ही कुछ छोटे बच्चे बिना कॉपी-किताब और पेन्सिल के कुछ गणित के सवाल कर रहे हैं | वास्तव में वे विभिन्न आकर के कप से पानी भर रहे हैं | ये एक सामान्य स्कूल है | यहाँ से पास में ही, इसी जिले के परदा सोलंकी गाँव में, एक अन्य उच्च प्राथमिक विद्यालय है जिसमे विभिन्न कक्षाओं के लिए, सीखने वाली चीज़ों से अच्छी पेंट की हुई दीवालों वाले कमरे हैं | यहाँ कुछ बच्चे रंग-बिरंगी अंग्रेजी की किताब पढ़ रहे हैं | इनमे से जब एक बच्चे को कुछ समझ में नहीं आता तो, शिक्षक के बजाय उसके साथ के बच्चे उसे समझने में उसकी मदद करते हैं |

कक्षा में मोबाइल फोन देखती लड़कियां।
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कक्षा में मोबाइल फोन देखती लड़कियां।

पूरे राजस्थान में सरकारी प्राथमिक विद्यालय यूनिसेफ के सहयोग से अब एक नए बाल-केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था के रूप में विकसित हो रहे हैं, जहाँ समूह में सीखने, बिना पुस्तकों के सीखने आदि के नए प्रयोग किये जा रहे हैं और उनका निरंतर आकलन भी किया जा रहा है | राजस्थान के स्टेट इनिशिएटिव फॉर क्वालिटी एजुकेशन (State Initiative for Quality Education (SIQE)) और यूनिसेफ के द्वारा किये जा रहे इस शिक्षा प्रणाली के इस बदलाव से नेशनल अचीवमेंट सर्वे 2017 में धीरे धीरे राजस्थान को सभी राज्यों से ऊपर ला दिया है | 2015 तक इन सरकारी स्कूलों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की बड़ी संख्या, कम हाजिरी और कम ससख पाने की समस्या थी | ऐसे समय में यूनिसेफ ने आगे बढ़ कर न केवल शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन किया बल्कि ढांचागत सहयोग और जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (DIET) की क्षमता वर्धन का भी काम किया |  शुरूआती 200 स्कूलों के साथ प्रायोगिक रूप से काम करने के बाद यूनिसेफ ने राज्य के सभी 64,606 सरकारी स्कूलों में नयी शिक्षा प्रणाली लागू करवाई |

एक शिक्षक अपनी कक्षा में बच्चों को पढ़ाता है।
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एक शिक्षक अपनी कक्षा में बच्चों को पढ़ाता है।

सभी छात्र-छात्राओं, अध्यापकों और अभिभावकों का ये मानना है कि इससे कक्षाओं में बदलाव आ गया है | गौथ महुदी (आसपुर प्रखंड, जिला गुर्गापुर) के उच्च प्राथमिक विद्यालय की कक्षा 7 की छात्रा भाविका मीना का कहना है कि हम सभी सीखने में एक-दूसरे की मदद करते हैं और फिर भी अगर कुछ समझ में नहीं आता तो अपने अध्यापकों से पूछ लेते हैं | उसकी अध्यापिका अनिता परमार ने बताया कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (DIET) द्वारा नियमित प्रशिक्षण ने उनकी संवाद और अध्यापन शैली में सुधार किया है | चूँकि अब पाठ गतिविधि आधारित हैं, बच्चे पहले की तरह सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए बेमन से पढ़ाई नहीं करते | आसपुर के मुख्य प्रखंड शिक्षा अधिकारी के कथन से भी उनकी बात की पुष्टि होती है “नयी शिक्षा प्रणाली से बच्चों में खुद से सीखने की क्षमता बढ़ी है, उनमे परीक्षा का डर कम हुआ है और कक्षा 6 में पहुँचने से पहले उनकी अंग्रेजी और गणित की अवधारणा और स्पष्ट हुई है | इसके आगे वो कहते हैं कि इससे राज्य में सीखने की क्षमता में और विस्तार होगा | ये शिखा प्रणाली नौ और प्रखंडों में कक्षा 8 तक बढ़ाई जा रही है | उन्होंने कहा “बेहतर सीखने की क्षमता बढ़ाने के लिए इसे पूरे राज्य में लागू किया जाना चाहिए|”

खेल के मैदान में खेलते बच्चे।
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खेल के मैदान में खेलते बच्चे।

अध्यापक – जिनका कक्षा में बच्चों को सिखाने में अहम् योगदान है, वे यूनिसेफ के सहयोग से DIET (डाइट) द्वारा आयोजित मासिक कार्यशाला में भाग लेते हैं | डाइट के वरिष्ठ प्रवक्ता कहते हैं, “वे नयी शिक्षा प्रणाली के बारे में अपने अनुभव साझा करते हैं और हम मिलकर उनके सामने आने वाली समस्याओं का हल खोजते हैं | ”परदा सोलंकी स्कूल के अध्यापक एवं प्रमुख संसाधन / मास्टर ट्रेनर देवानंद उपाध्याय स्वीकार करते हैं कि पहले हम कक्षाओं में बिना किसी योजना के चले जाते थे |

बच्चों द्वारा चित्रित भारत का मानचित्र।
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बच्चों द्वारा चित्रित भारत का मानचित्र।

अब हम 15 दिन पहले ही योजना तैयार कर लेते हैं और ये सुनिश्चित करते हैं कि किसी पाठ के पढ़ने में कोई बच्चा पीछे न छूट जाये | अध्यापकों का ये भी कहना है कि अब बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों से निकल कर सरकारी स्कूलों में डाल रहे हैं | गौथ महुदी की आँगनबाड़ी कार्यकर्त्री यशोदा भी उनमे से एक हैं | अन्य माता-पिता से सरकारी स्कूलों अध्यापकों, कक्षा में अपनाई जा रही रचनात्मक पद्धति और माता-पिता की बढ़ी भूमिका की तारीफ सुनकर उन्होंने अपने बच्चों भाविका और वीरेंद्र को सरकारी स्कूल में डालने का निर्णय लिया | उन्होंने कहा कि “प्राइवेट स्कूलों में उनके बच्चों को इस तरह शामिल नहीं किया जाता था |” “अब दोनों बच्चों को स्कूल जाने में मज़ा आता है, पढाई में उनकी रूचि बढ़ी है और शैक्षिक प्रदर्शन बि पहले से बेहतर हुआ है |

बच्चों ने स्कूल में दोपहर का भोजन परोसा।
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बच्चों ने स्कूल में दोपहर का भोजन परोसा।

अध्यापक एवं बच्चों दोनों को लगता है कि नयी शिक्षा प्रणाली से उनके बीच बेहतर संवाद स्थापित हुआ है | शायद इसी शिक्षा प्रणाली और उसके बेहतर नतीजों से ही इस थर रेगिस्तान के सुदूर कोने में रहने वाले इन बच्चों, जिनमे अधिकतर पढ़ने वाली पहली पीढ़ी के हैं, के मन में कुछ बड़े सपने देखने का विश्वास पैदा हुआ है | यशोदा देवी का बेटा वीरेंद्र, जो कि अब आठवीं कक्षा में है, बड़ा हो कर एक पुलिस अधिकारी बनना चाहता है | उसकी बेटी भाविका मेडिकल के क्षेत्र में जाना चाहती है | उन्होंने कहा कि “उन्हें यहाँ जिस तरह की शिक्षा मिल रही है उससे मुझे उम्मीद जगाई है और शायद उनका जीवन मेरे से बेहतर होगा |”