एक मृत पैदा हुए बच्चे की यादें

प्रत्येक मृत बच्चे का जन्म एक दुखद घटना होती है| एक मज़बूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के द्वारा बड़ी संख्या में मृत पैदा होने वाले बच्चों पर रोक लगाई जा सकती है |

सोनिया सरकार एवं जाफरीन चौधरी
ओडिशा के कालाहांडी जिले में  अपने गांव में अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी हुई गोलापी का तीसरा बच्चा मृत पैदा हुआ था।
यूनिसेफ़
27 अक्तूबर 2020

सिज़ेरियन सेक्शन के माध्यम से एक मृत लड़के को जन्म देने के अपने दुःख को याद करते हुए गोलापी (33) कहती है, “मैं किसी को दोष नहीं देती। अस्पताल में नर्सों ने कहा, मुझे पहले आना चाहिए था। लेकिन जो हुआ, सो हुआ।“ वह आघात और दर्द के उन दिनों को याद नहीं करना चाहती है जब उसके तीसरे बच्चे का जन्म हुआ जो मृत पैदा हुआ था।[i]

गोलापी को कभी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। ग्रामीण भारत के ओडिशा के कालाहांडी जिले के नुनपुर पंचायत के सुदूर जंबाहली गाँव में उसका जीवन घरेलू कामकाज, खेतों में कभी-कभार खेती करने और उनके पति बशिष्ठ राना और दो बच्चों एक 15 वर्षीय बेटी और छह साल के बेटे की देखभाल करने का एक मिला जुला स्वरुप है ।

गोलापी ने निष्ठापूर्वक ग्राम स्वास्थ्य कार्यकर्ता के निर्देशों का पालन किया था और नियमित रूप से अपनी प्रसव-पूर्व जांच के लिए जाती थी। जून 2020 की शुरुआत में, सहायक नर्स एवं मिडवाइफ(एएनएम) ने उसकी गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप की पहचान "उच्च जोखिम" की स्थिति के रूप में की थी और आगे की जांच के लिए उसे 30 किलोमीटर दूर तुसरा में निकटतम सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रेफर कर दिया था।हालाँकि, उसका परिवार उसे जिला मुख्यालय अस्पताल बोलंगीर ले गया था। उसने जिला मुख्यालय अस्पताल में अपने पहले बच्चे को जन्म दिया था और अपने तीसरे बच्चे को वहीं जन्म देने की योजना भी बनाई थी। उसे उच्च रक्तचाप के लिए दवाएं दी गईं और एक अल्ट्रासाउंड से पता चला कि बच्चा ठीक था और उसका वजन लगभग 3.2 किलोग्राम था। अस्पताल में चार दिन रहने के बाद, गोलपी घर लौट आई थी।

हालांकि, एक सप्ताह बाद, उसकी गर्भनाल में थोड़ी जगह और हलचल हुई और उसने महसूस किया कि बच्चा हिल नहीं रहा है। अस्पताल जाने के विषय में निर्णय लेने और भाड़े का एक वाहन ढूंढने में दो घंटे से अधिक का समय लग गया। दंपत्ति तुसरा में समुदाय स्वास्थ्य केंद्र के लिए निकला, जहाँ पहुंचने में एक घंटे से अधिक समय लगा। वहां के डॉक्टरों ने उसे जिला मुख्यालय अस्पताल बोलंगीर में रेफर कर दिया, जहां उसे सिजेरियन सेक्शन किया गया और उसने एक मृत बच्चे को जन्म दिया। डॉक्टरों ने उसे समझाया कि "उसे पहले आना चाहिए था।"

लेकिन, गोलापी कितना जल्दी आसकती थी? निकटतम सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तुसरा में 30 किलोमीटर दूर है और आस-पास का सबसे बड़ा, सुसज्जित अस्पताल - जिला मुख्यालय अस्पताल - जम्बहली से 70 किलोमीटर दूरबोलंगीर में है। सड़क की स्थिति खराब है और बोलंगीर तक पहुंचने में तीन घंटे से अधिक समय लगता है।

मृत शिशु के जन्म का सबसे संभावित कारण उच्च रक्तचाप था जिससे गर्भ में गर्भनाल अलग हो गया और अगर गोलपी समय पर अस्पताल पहुँचपाती, तो इसे रोका जा सकता था। यह पूर्व-एक्लम्पसिया की उसकी स्थिति को रोकने में मदद कर सकता था जिसके कारण गर्भ में गर्भनाल अलग हो गया।

सामाजिक रूप से, उसकेमृत शिशु के जन्म का कारण किशोरावस्था में उसका गर्भधारण करना हो सकता है। कम उम्र में गर्भधारण आमतौर पर जीवन भर रहने वाले प्रभाव छोड़ताहै।

भारत मृत शिशु जन्म दर कम करने के लिए प्रतिबद्ध है

यूनिसेफ इंडिया की प्रतिनिधि डॉ. यास्मीन अली हक ने कहा,“भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मृत शिशु जन्म को कम करने में काफी प्रगति की है। देश में मृत शिशु जन्म को रोकने के लिए उच्च स्तर की राजनीतिक प्रतिबद्धता और निवेश को देखकर खुशी होती है । प्रत्येक मृत शिशु जन्मएक दुखद घटनाहै। एक मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तंत्र के माध्यम से बड़ी संख्या में मृत शिशु जन्म रोके जा सकतेहैं। यह सुनिश्चित करना हमारी संयुक्त जिम्मेदारी है कि प्रत्येक महिला गर्भावस्था के दौरान स्वस्थ व्यवहार और प्रथाओं के बारे में जागरूक हो और उन्हें अपनाए। यह महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को प्रसव से पहले और उसके दौरान कुशल और गुणवत्तापूर्ण देखभाल समय पर प्राप्त हो ।“

पहले से मौजूद स्वास्थ्य परिस्थितियां, किशोरावस्था गर्भावस्था, गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, गर्भवती माताओं में एनीमिया की उच्च दर, पूर्व-एक्लेम्पसिया जैसी स्थिति, गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की अपर्याप्त उपलब्धता और गरीबी कुछ ज्ञात कारक हैं जो मृत शिशु जन्म की उच्च दर में योगदान देते हैं। अधिकांश मामले प्रसव के दौरान या गर्भावस्था के अंतिम हफ्तों के दौरान होते हैं। भारत मातृ और नवजात स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के अपने एजेंडे के हिस्से के रूप में, मृत शिशु जन्म की संख्या और कम करने के लिए प्रतिबद्ध है |(ii)

आरती सेनापति, जो एक सहायक नर्स एवं मिडवाइफ(एएनएम) हैं, जिन्होंने ग्रामीण ओडिशा में पिछले 32 वर्षों में अनगिनत महिलाओं को सुरक्षित गर्भधारण करने में मदद की है, वे कहती हैं, “मैं उन महिलाओं को जानती हूँ जिन्हें प्याज, मिर्च के छोटे हिस्से के साथ केवल चावल खाने को मिलता है या सब्जियों के कुछ टुकड़े। फिर वे महिलाएं हैं, जो गर्भावस्था के उन्नत चरण के दौरान भी कठिन श्रम करती हैं। जल्दी विवाह और बार-बार गर्भधारण से भी मृत शिशु जन्म का खतरा बढ़ जाता है। ”

अपने कैरियर के तीन दशकों में, आरती ने मृत शिशु जन्मकी संख्या में कमी की दिशा में प्रगति देखी है। उन्होंने आगे कहा “सरकार ने कई पहल की हैं और आज अधिक महिलाएं इस बात से अवगत हैं कि उन्हें अपनी गर्भावस्था के दौरान स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के पास जाना है, आयरन फोलिक एसिड की खुराक लेने और अनिवार्य टीकाकरण कराना है। मैं महिलाओं को उनकी प्रसव की तारीख से पहले अस्पताल में जांच कराते हुए भी देखती हूं।

आरती कहती हैं “बार-बार गर्भधारण को रोकने के लिए बच्चों के जन्म में अंतर रखने पर जोर देने की जरूरत है। आदिवासी समुदायों में भी महिलाओं को अधिक मदद देने की आवश्यकता है क्योंकि वे गर्भावस्था के दौरान कई स्वास्थ्य समस्याएँ बताती हैं।”

यूनिसेफ स्वास्थ्य सुविधाओं और सामुदायिक स्तर पर मातृ और नवजात सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार के लिए सरकार और नागरिक समाज संगठनों के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहा है। ये कार्य प्रशिक्षण, निगरानी और स्वास्थ्य कर्मचारियों के परामर्श और केंद्रित कार्यक्रमों के माध्यम से, विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों और जनजातीय आबादी को लक्षित कर, किए जा रहे हैं ।

उसके बाद गोलापी ने नसबंदी करा ली। उसने कहा " पहले से ही मेरे दो बच्चे हैं और मैं अधिक बच्चे नहीं चाहती" । हालांकि वह मुश्किल अनुभव के साथ सामंजस्य स्थापित कर चुकी होगी और "आघात को दोबारा याद नहीं करना चाहती", ऐसी कई महिलाएं हैं जो अपनी गर्भावस्था और अपने बच्चे के खोने के सदमे की यादों से उबर नहीं पाती हैं।

एक एएनएम और एक माँ के रूप में, आरती मृत शिशु को जन्म देने वाली महिलाओंकी गहरी पीड़ा को समझती हैं। वह मां का साथ देने की जरूरत पर बल देती हैं और उसे और परिवार को भावनात्मक सहायता प्रदान करती हैं। वह कहती हैं“मुझे एक युवा आदिवासी महिला याद है जिसने अपना पहला बच्चा खो दिया था और दुःख से बहुत आहत हो गई थी। मैं उसके साथ नियमित संपर्क में रही और उसे परामर्श दिया । बाद में उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।“

i  मृत शिशु वह होता है जिसकी गर्भ में मृत्यु हो गई है और जो गर्भावस्था के पहले 28 सप्ताह तक जीवित रहा है। नवजात की मृत्यु पहले 28 दिनों में होती है।

ii भारत नवजात शिशु कार्य योजना 2014