आत्म निर्भरता के कवच के साथ, स्वच्छता स्वयं सेवकों (स्वावोस) द्वारा एक क्रांति

समय, शक्ति और धन – वे इन सबके साथ तैयार हैं |

अज़रा परवीन रहमान
Girls washing hands in school.
UNICEF India
24 जून 2019

समय, शक्ति और धन – वे इन सबके साथ तैयार हैं | तेलंगाना में स्वच्छता वालंटियर्स (स्वावोस) की एक नयी फौज ने अपने घर, स्कूल और गाँव को स्वच्छ और स्वस्थ बनने की दिशा में काम करने का जो बीड़ा उठाया है, वो एक नयी क्रांति की शुरुआत है | 

ज्यादातर कहानियों का अंत बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में होता है, लेकिन उसके बाद क्या होता है, ये कोई नहीं जानता | क्या अच्छाई का प्रभाव बना रहता है ? 25 वर्षीय सिरिषा परमाला को पता है की जीतने के बाद की लड़ाई कितनी कठिन होती है | और इसीलिए यह युवती अपनी ही तरह की अन्य युवतियों के साथ वेल्धी, तेलंगाना के एक स्कूल परिसर में, एक गोले में बैठी है और उनसे ये जानना चाहती है कि कैसे उनका गाँव, जो कि 2 साल पहले खुले में शौच मुक्त घोषित हुआ है, इसी पारकर बना रहेगा और किस प्रकार जल और स्वच्छता उनकी प्रथमिकत अमे सबसे ऊपर रहेगा | कल सिरिषा की सगाई है, फिर भी वो आज इन स्वच्छता वालंटियर्स (स्वावोस) के समूह के साथ बैठी है, जिन्होंने अपने पर्यावरण को स्वच्छ और स्वस्थ रखने में आत्मनिर्भर होने के संकल्प का कवच धारण कर लिया है |

मैदान में बैठे शिक्षक और बच्चे
UNICEF India
मैदान में बैठे शिक्षक और बच्चे

स्वच्छता वालंटियर्स (स्वावोस) के रूप में एक बड़े स्वच्छता अभियान के लिए ज़मीनी स्तर पर एक नए और मौलिक स्वयंसेवी नागरिक समायोजन यूनिसेफ विचार से शुरू हुआ और इसे करीमनगर जिला प्रशासन ने खुले दिल से समर्थन किया और इसे 2018 में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया | स्वच्छ भारत अभियान को अपनाने एवं उसको आगे ले जाने के उद्देश्य के माध्यम से तुरंत लोगों के विभिन्न समूहों को इसके लिए प्रेरित एवं उत्साहित किया गया | इसी कारण से जब पिछले वर्ष जुलाई में स्वावोस शुरू हुआ स्वयंसेवी लोगों ने बड़ी संख्या में अपने को पंजीकृत किया |

शिक्षिका से हाथों की सफाई कैसे करें, सीखते हुए बच्चे
UNICEF India
शिक्षिका से हाथों की सफाई कैसे करें, सीखते हुए बच्चे

अपने काम की दीवानी: सिरिषा

सिरिषा उन लोगों में से है जिन्होंने तुरंत अपना पंजीकरण कराया | वो समाज कार्य में परा-स्नातक की छात्रा है और गोदावरी कानी गाँव की रहने वाली है और 60 किमी की यात्रा कर के स्वावोस की बैठक में भाग लेने के लिए वेल्धी आयी, ये दोनों ही स्थान करीमनगर ज़िले में हैं | उसने मुस्कुराते हुए कहा, “दूरी मेरे लिए कोई अड़चन नहीं है”, और उसने छः गावों के नाम बताये, जो एक दूसरे से 80-90 किमी की दूरी पर हैं और जहाँ वो पिछले दो वर्षों से स्वावोस के रूप में कार्य कर रही है | उसने अब तक इन यात्राओं पर 1000 रु. (13.97 यू. एस. डॉलर) खर्च किये हैं; कोई भी स्वावोस इस कार्य के लिए अपनी इच्छानुसार गावों का चयन कर सकता है |

शिक्षिका के सामने हाथों की सफाई करती हुई सिरिषा
UNICEF India
शिक्षिका के सामने हाथों की सफाई करती हुई सिरिषा

सिरिषा उन 54 प्रमुख स्वयंसेवियों में से एक है, जिन्होंने यूनिसेफ, आईकिया और स्थानीय सहयोगियों के सहयोग से अक्टूबर, 2018 में स्वच्छता, हाथ-धुलना और मासिक-धर्म सम्बन्धी स्वच्छता आदि विषयों पर आयोजित दो-दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया | 

उसने कहा, “ जब मैं घर-घर जा कर लोगों से शौचालय के इस्तेमाल के महत्त्व के बारे में बात करती हूँ, तो उन्हें ये भी बताती हूँ कि ये किस प्रकार महिलाओं की सुरक्षा और मासिक-धर्म सम्बन्धी स्वच्छता से भी जुड़ा है और किस प्रकार उन्हें इन चीजों के लिए समझौता करना पड़ता है, जब वे शौच के लिए बाहर जाती हैं |

पके बाल, दृढ़ इच्छा शक्ति: मदादी अरुणा

पास में बैठी, 70 वर्षीया मदादी अरुणा ने भी उसकी बातों से अपनी सहमति जतायी | आज की बठक में शामिल 30 स्वावोस में सबसे अधिक उम्र की अरुणा वेल्धी से ही हैं, और उन्होंने बताया कि उन्हें स्वच्छता स्वयं सेवक बनना इसलिए अच्छा लगा क्योंकि वे लोगों की निःस्वार्थ सेवा में विश्वास करती हैं | इसके अलावा वो इस अभियान से आने वाले परिवर्तन को भी देख सकती हैं | उन्होंने बताया “पहले शायद ही कहीं कोई शौचालय था और खुले में शौच के लिए जाना आम बात थी | लेकिन अब सबके घर में शौचालय है और हम घर-घर जाकर लोगों को शैचालय इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करते हैं | हम स्वयं सेवक लोग सड़कें भी साफ़ करते हैं |”

स्कूली बच्चों में पेयजल एवं स्वच्छता के लिए पैदा हुई इस जागरूकता की गति को बनाए रखने के लिए अरुणा ने 100 रु. (यू. एस. डॉलर 1.40) का योगदान किया जिससे कि अपनी तरह का एक ‘साबुन बैंक’ जिला परिषद् हाई स्कूल, वेल्धी में, जहाँ वे अपनी बैठक करती थीं, शुरू किया जा सके | इसकी शुरुआत क्लस्टर फैसिलिटेटर (समूह सहायक) कल्याणी के साथ स्वयं सेवकों के साथ विद्यालय के भ्रमण से हुई, जहाँ उन्होंने शौचालय साफ़ किये और कुछ गतिविधियाँ आयोजित कीं | यहाँ उन्होंने ये महसूस किया की, यद्यपि बच्चे खाने के पहले अपना हाथ धो रहे थे, लेकिन वहां कोई साबुन नहीं था | उस टीम ने तुरंत स्कूल के बच्चों के लिए साबुन खरीदने के लिए पैसे इकठ्ठा किये | गाँव के स्वयं सहायता समूह के लोग भी इसमें शामिल हो गए और यह तय हुआ कि साबुन का एक कार्टन स्कूल में रखा जायेगा और जब ये ख़त्म होगा तो इसके बारे में लोगों को बता दिया जायेगा और कोई भी कितनी भी राशी का सहयोग कर सकता है जिससे की उसे फिर भरा जा सके | उदहारण के लिए सिरिषा ने 50 रु. (यू. एस. डॉलर 0.70) का सहयोग किया |

ज़िन्दगी का सबक सिखाती: के. अनिता  

जब समर्पण और उत्साह चरम पर हो और साथ में मिले-जुले लोगों का समूह हो तो निश्चित रूप से बड़े अच्छे अच्छे और खूब सारे नये नये आईडिया आयेंगे | जग्तियाल जिले में कोंदापुर हाई स्कूल की शिक्षिका और एक स्वच्छता स्वयं सेवक के. अनिता ने अपने स्कूल के शौचालय को रंग-बिरंगा और आकर्षक बनाने का निश्चय किया जिससे लड़कियों को शौचालय के इस्तेमाल में कोई शर्मिंदगी न महसूस हो | वे बताती हैं, पहले लड़कियों को शौचालय के पास जाने में शर्मिंदगी होती थी | 

मैंने शौचालय की दीवाल पर एक पंखों का जोड़ा पेंट करने के निश्चय किया और उस पर लिखवा दिया, ‘आओ और मेरे साथ उड़ान भरो’|

अब न केवल लड़कियां वहां बेझिझक जाती हैं बल्कि अब वह एक लोकप्रिय ‘सेल्फी’ पॉइंट बन गया है | 

इससे उत्साहित होकर उन्होंने अपने पैसे से अन्य शौचालय की दीवालों को भी पेंट कराया और उन पर बाल-श्रम, पर्यावरण और शिक्षा के महत्त्व सम्बन्धी सन्देश लिखवाए | उन्होंने स्कूल की पानी की टंकी की मरम्मत कराने में भी मदद की |

बच्चों के हाथों की सफाई करते हुए माधवराम
UNICEF India
बच्चों के हाथों की सफाई करते हुए माधवराम

अँगुलियों से मज़बूत मुट्ठी: माधवराम मनोहर

अपनी शुरुआत से अब तक स्वावोस मोबाइल एप्प में अब तक 2,200 स्वयंसेवक पंजीकृत हो चुके हैं | इसने लोगों को प्रेरित करने की प्रतिक्रिया की एक कड़ी से शुरू कर दी है | उदहारण के लिए 25 वर्षीय स्वावोस माधवराम मनोहर बताते हैं उनका 8 दोस्तों का एक समूह है जो उनके काम की रणनीति तय करते हैं और विभिन्न गावों के भ्रमण की योजना बनाते हैं |  

मनोहर के गाँव गंगीपल्ली में, जहाँ से उसने अपना काम शुरू किया था, उसके दोस्तों ने प्राथमिक विद्यालय का भ्रमण किया और पाया कि उसमे एक शौचालय था जो की प्रयोग में नहीं था, उसमे कोई नल नहीं था, इस कारण कोई भी बच्चा या रसोइया अपने हाथ नहीं धोता था | मनोहर ने बताया, “वहां एक पानी की टंकी थी जिसे मैंने और मेरे दोस्तों ने सबसे पहले ठीक किया और उसे साफ़ किया | सरपंच से बात करने पर पता चला कि ग्राम पंचायत के पास कुछ निर्माण सामग्री थी जो किसी काम में नहीं थी और जिसे उस उस पानी के नल को ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था | हमने भी 200 रु. (यू. एस. डॉलर 2.79) का योदन किया और स्कूल के लिए साबुन खरीदा और सरपंच को इस बात के लिए राज़ी किया कि इस व्यवस्था को चलते रहने के लिए, वो जरूरत के मुताबिक साबुन उपलब्ध कराते रहेंगे |” उनके प्रयास से अब विद्यालय शौचालय इस्तेमाल के लायक हो गया था और नल में भी पाने आने लगा था – इससे इन युवा लड़कों में तत्काल एक संतोष का भाव आ गया था |

“स्वावोस प्रशिक्षण कार्यक्रम (आईकिया एवं यूनिसेफ के सहयोग से) ने हमें यह समझ पाने में मदद की कि एक आदर्श गाँव किस तरह का होना चाहिए”, मनोहर कहता है, “इससे अधिक संतोषजनक कुछ नहीं हो सकता कि हमारे अपने प्रयासों से यह सच हो रहा है | वह अपने काम के अतिरिक्त हफ्ते में दो दिन का समय गाँव में स्वयं सेवक के रूप में देता है |   

स्वावोस के माध्यम से खुले में शौच मुक्त ज़िले (ओ डी एफ) प्रगति पर है

क्लस्टर फैसिलिटेटर (समूह सहायक) द्वारा 2018 में करीमनगर और जगतिआल – दोनों खुले में शौच मुक्त ज़िले (ओ डी एफ) – में क्रमशः 8 प्रतिशत और 9.6 प्रतिशत की कमी पायी गयी थी | स्वावोस के द्वारा निरंतर सहयोग से अब ये कमी 2 प्रतिशत और 2.6 प्रतिशत रह गयी है | दूसरे शब्दों में खुले में शौच मुक्त (ओ डी एफ) की गति बढ़ रही है |

सिरिषा ने इन शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त की, “सरकार जो कर सकती है कर रही है, लेकिन अगर हम अपने स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी खुद नहीं लेंगे, तो अंत में हमें ही भुगतना पड़ेगा |